उत्तराखंड को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता। चारों धामों के अलावा देश के 51 प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शुमार मां पूर्णागिरि का धाम भी उत्तराखंड के चंपावत जिले में पड़ता है। देश की राजधानी दिल्ली से महज 350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह सुप्रसिद्ध मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। हर साल चैत्र नवरात्रि के दौरान इस प्रसिद्ध धाम में तीन महीने का राजकीय मेला लगता है, जिसमें उत्तराखंड, यूपी और पड़ोसी देश नेपाल के अलावा कई राज्यों से श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए आते हैं।
पूर्णागिरि में गिरी थी माता सती की नाभि: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णागिरि धाम में माता सती की नाभि गिरी थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता सती के पिता दक्ष प्रजापति ने अपने महल में एक यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने अपने दामाद भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा था। माता सती इससे क्रोधित हो गईं और वे जलते हुए हवन कुंड में कूद गईं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जैसे ही यह सूचना भगवान शिव को मिली तो वे भी दक्ष प्रजापति के महल में पहुंच गए और क्रोध में माता सती के जलते हुए शरीर को लेकर आकाश में घूमने लगे। भगवान भोलेनाथ के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के 51 टुकड़े कर दिए थे, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में गिरे, जो बाद में शक्ति पीठों के रूप में स्थापित हो गए।
मां पूर्णागिरि भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं: पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती की नाभि टनकपुर के अन्नपूर्णा पर्वत में गिरी थी, जिसे आज माता पूर्णागिरि के नाम से पूजा जाता है। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता पूर्णागिरि के दर पर आता है, मां उसकी हर मनोकामना पूरी करती हैं।मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जब माता की चुनरी प्रचलन में नहीं थी, तब भक्त पहाड़ी की घास में गांठ बांधकर मनोकामना मांगते थे। अब मां के दरबार में चुनरी में गांठ बांधकर मुराद मांगने का रिवाज है। मुराद पूरी होने पर लोग दुपट्टे की गांठ खोलने के लिए भी मां के दरबार में आते हैं।मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद काली मंदिर और बाबा भैरव मंदिर के दर्शन जरूर करें: मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद श्रद्धालु काली मंदिर के दर्शन करते हैं। इसके बाद श्रद्धालु बाबा भैरव मंदिर के दर्शन कर टनकपुर के लिए रवाना होते हैं। मां पूर्णागिरि के दरबार में बच्चों का मुंडन संस्कार भी काफी प्रचलित है। इस दरबार में हर साल सैकड़ों लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराने आते हैं।
मां पूर्णागिरि धाम के रास्ते में एक झूठा मंदिर भी स्थापित है। यह भी इस दरबार में आने वाले लोगों की आस्था का केंद्र है। उस मंदिर के पीछे मान्यता है कि एक निःसंतान दंपत्ति ने मां से संतान प्राप्ति की प्रार्थना की थी। साथ ही उन्होंने संतान प्राप्ति पर विशाल सोने का मंदिर चढ़ाने का संकल्प भी लिया था। कहते हैं कि जब निःसंतान दंपत्ति को मां के आशीर्वाद से संतान सुख मिला तो उनके मन में लालच पैदा हो गया। वे मंदिर में लोहे पर सोने का पानी चढ़ाकर मां के दरबार में आए। लेकिन जब उन्होंने भैरव मंदिर से आगे मंदिर को विश्राम के लिए नीचे रखा तो मां के चमत्कार के कारण मंदिर को वहां से उठाया नहीं जा सका। तभी से उस स्थान पर झूठा मंदिर विद्यमान है। इसलिए मां के मंदिर को सच्चे दरबार के रूप में भी मान्यता प्राप्त है, जो भी भक्त सच्चे मन से मां पूर्णागिरि के दरबार में प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।
माता पूर्णागिरि धाम कैसे पहुंचें धाम: पूर्णागिरि धाम पहुंचने के लिए आपको उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर पहुंचना होगा। आप रेल और बस दोनों से टनकपुर पहुंच सकते हैं। दिल्ली, देहरादून और लखनऊ समेत देश के कई शहरों से आपको टनकपुर के लिए सीधी ट्रेन मिल जाएगी। टनकपुर से पूर्णागिरि धाम करीब 20 किलोमीटर दूर है, जहां आप टैक्सी या बस से आसानी से जा सकते हैं।
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